सदियों से विकासशील देशों मे रोजगार की तलाश में अपने घर या
गाँव से बाहर किसी अन्य राज्य या क्षेत्रों में प्रवासीकरण होता रहा है. भारत में खासकर
बिहार में प्रवासीकरण की यह दर बहुत ज्यादा है और इसमें कृषक मजदुरों का प्रतिशत
सबसे अधिक है. राष्ट्रीय नमुना सर्वेक्षण के वर्ष 2005 के आंकडे बताते हैं कि देश
में कुल बेरोजगारों का लगभग 74% ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं और इसमें भी
मजदूरों की सन्ख्या सर्वाधिक है. इतिहास पर नजर डालें तो स्थिति दयनीय नजर आती है.
1931 की जनसंख्या के आंकडे बताते है कि भारत की कुल कृषक जनसंख्या का 1/3 भाग
मजदुर था. इसके बाद की हरेक जनगणना मे कृषक मजदुरों की संख्या बढती गयी. 2001 की
जनसांख्यिकी के मुताबिक बिहार में कुल मजदुरों में 37.25% कृषक मजदुर हैं. और विडंबना
तो यह है कि बिहार के अंदर भी इस मामले में क्षेत्रीय असमानता मौजूद है. पुर्वी
बिहार में 68%, उत्तरी पुर्वी बिहार में 90%, दक्षिणी बिहार में 55%. इन बातों का
सीधा मतलब है कि एक तरफ़ तो कृषक मजदुरों की संख्या बढ रही है, लेकिन दूसरी तरफ़
किसानो की संख्या घट रही है.
आजादी के बाद से
हीं असमान क्षेत्रीय विकास और कुछ खास हिस्सों में आधुनिक उद्योगों का केन्द्रीकरण
किया गया. इससे उन स्थानों के इर्द-गिर्द थोड़े से लोगों का जीवन स्तर भी उपर उठा.
लेकिन इसमें अन्तनिर्हित प्रक्रिया के चलते देश का विशाल हिस्सा, खासकर ग्रामीण
आर्थिक जीवन के हाशिये पर चला गया, जिसमें बेरोजगारी जीवन की स्थायी स्थिति बन गई.
और ऐसी स्थिति में पलायन एक विवशता बन गई.
यह सर्वग्यात तथ्य
है कि बिहार से आमतौर पर कृषक मजदुरों का पलयान पंजाब, हरियाणा, दिल्ली जैसी
विकसित जगहों पर होता है जबकि गैर कृषक मजदूर गुजरात और महाराष्ट्र जैसे औघोगिक
राज्यों का रुख करते हैं.अधिकतर प्रवासीकरण मौसमी होता है और बदलती परिस्थितियों
में मजदूरी न केवल अनुसूचित जाति का हीं पेशा रह गयी है, पिछडी जाति और ऊचीं
जातियों के लोग भी बाहर् के प्रदेशों में काम की तलाश में जा रहे हैं. ऱाज्य के
अमुमन हरेक रेलवे स्टेशनों से प्रवासी मजदूरों के लिये विशेष ट्रेनें चलायी गयी
हैं जो आमतौर पर भरी रह्ती हैं. यह दर्शाता है कि राज्य मे कल्याणकारी योजनाओं के
कार्यान्यवन के बावजूद गरीबों की बेरोजगारी दर मे कोई खास कमी नही आई है. इस पलायन
से बिहार की अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान होता है. आज के ग्रामीण बिहार का सच यह
है की गाँव मे काम लायक मजदूर नही मिलते, किसानी का धंधा मंदा हो गया है.
इस परिदृश्य का एक
दुसरा पहलु है- जातीवादी व्यवस्था. बिहार मे अभी भी जातीवाद का असर मारक है और
अन्याय व शोषण की दुनिया से बाहर निकलकर गरीब एक तरह की रहात महसूस करते हैं. उल्लेखनीय
है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की कृषि विकास दर में कमी आई है और लक्षित 4% की
वृद्धि दर को नही पाया जा सका है; जबकि सेवा क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन कर रहा है.
बिहार के हालात भी कुछ ऐसे हीं हैं.
ऐसा नही है कि
पलायन का कोई सकारात्मक पक्ष नही है. 2009 की मानव विकास रिपोर्ट, जिसका विषय
पलायन और विकास था, बताती है कि इस असमान दुनिया में मानव गतिशीलता आदमी की आय,
स्वास्थय, व शिक्षा सम्भावनाओं को बढाने मे काफ़ी असरकारी साबित हो सकती है. परंतु,
इसके साथ ही रिपोर्ट इस गतिशीलता से जुडी नकारात्मक तथ्यों की और ध्यान दिलाते हुए
इस बात पर जोर देता है कि प्रवासन अधिक से अधिक एक ऐसा मार्ग है जो निर्धनता मे
कमी और मानव विकास में सुधार लाने के व्यापक स्थानीय और राष्ट्रीय प्रयासों को
पुरित करता है. लेकिन यह कभी भी राष्ट्रीय विकास के लिए एक निर्धारक तत्व नहीं बन
सकता. इसलिए जरुरत इस बात की है कि प्रवासीकरण की तह तक जाकर प्रभावी कल्याणकारी
नीतियाँ बनायीं जाएँ. बिहार के संदर्भ मे यह बात ज्यादा जरुरी है क्योंकि यहाँ के
प्रवासी मजदूरों के साथ अन्याय और शोषण होता रहा है. हाल मे हीं असोम और
महाराष्ट्र में बिहारी मजदूरों के साथ हुई हिंसा के निहितार्थ सतह पर दिखायी देती
चीज़ों से ज्यादा गहरे हैं. असुरक्षा और टकराव की वजह से जो चुनौतियाँ प्रवासी
मजदूरों को उठानी पडती है, उसका मुकम्मल हल तलाशे जाने की जरुरत है.
No comments:
Post a Comment